सतीश ठाकुर।
मंडी। अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव मंडी सदियों से शैव, वैष्णव और लोक परंपराओं के संगम का प्रतीक रहा है। यह महोत्सव न केवल मंडी की धार्मिक आस्था, बल्कि इसकी सांस्कृतिक चेतना और समृद्ध देव परंपरा को भी अभिव्यक्त करता है। हर वर्ष आयोजित होने वाला यह महोत्सव मंडी नगर की विशिष्ट पहचान बन चुका है।
विपाशा (ब्यास) नदी के तट पर बसी सांस्कृतिक नगरी मंडी में इस वर्ष 16 से 22 फरवरी तक अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है, जो नगर की सांस्कृतिक निरंतरता और ऐतिहासिक विरासत को रेखांकित करता है। महोत्सव में बाबा भूतनाथ शैव परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि राज देवता माधो राय वैष्णव परंपरा के प्रतीक माने जाते हैं। वहीं बड़ा देव कमरूनाग लोक आस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं। शैव परंपरा का अर्थ भगवान शिव की उपासना से है, वैष्णव परंपरा भगवान विष्णु एवं उनके अवतारों की भक्ति से जुड़ी है, जबकि लोक परंपरा क्षेत्रीय देवी-देवताओं और स्थानीय आस्थाओं का प्रतिनिधित्व करती है।
महोत्सव के दौरान विभिन्न क्षेत्रों से देवताओं का मंडी आगमन होता है। देव मिलन की यह परंपरा मंडी की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है। पारंपरिक विधि-विधान के साथ आयोजित धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-अर्चना और शोभायात्राएं महोत्सव का प्रमुख आकर्षण रहती हैं।
अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि मंडी की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विविधता का भी प्रतीक है। इस महोत्सव के माध्यम से देव संस्कृति और परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
उपायुक्त मंडी अपूर्व देवगन ने बताया कि मंडी नगर की स्थापना के 500 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, ऐसे में इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव को और अधिक गौरवपूर्ण व भव्य रूप में मनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि महोत्सव के सफल आयोजन के लिए मेला समिति द्वारा सभी आवश्यक तैयारियां की जा रही हैं, ताकि श्रद्धालुओं और आगंतुकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा सकें।
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