सतीश ठाकुर।
शिमला। हाई कोर्ट में जस्टिस उमेश वर्मा की बेंच में चल रहे मामले पर आज बड़ा फैसला आया है। कोर्ट ने साफ आदेश दिया है कि 28 फरवरी से पहले पंचायती राज और अर्बन लोकल बॉडीज़ को पूरा चुनावी प्रोसेस कम्प्लीट करना होगा ,
जिसमें वोटर लिस्ट अपडेट, रिज़र्वेशन रोस्टर, प्रशासनिक तैयारियां सब शामिल है और 30 अप्रैल से पहले चुनाव आयोग को पंचायत चुनाव कंडक्ट करने ही होंगे। यह फैसला इसलिए इतना बड़ा है क्योंकि पूरा प्रदेश इस पर अटका हुआ था। 75 लाख लोग, पंचायत प्रतिनिधि, कर्मचारी, प्रशासन कृ सब इंतज़ार कर रहे थे कि चुनाव टलेगा या तय समय पर होगा।
सरकार के तर्क क्या थे?
सरकार ने कोर्ट में दो मुख्य वजहें दी थी :
डिज़ास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत आपदा घोषित है।
इसे आधार बनाकर कहा गया कि सड़कों की स्थिति और हालात चुनाव के लिए अनुकूल नहीं हैं।
स्कूल परीक्षाएं फरवरी-अप्रैल में पड़ती हैं।
इसलिए चुनावी प्रबंधन मुश्किल होगा और 6 महीने की मोहलत दी जाए।
याचिकाकर्ता का पक्ष क्या था?
याचिकाकर्ता ने क्लियर कहा :
संविधान के आर्टिकल में पंचायतों का टेन्योर 5 साल तय है, 5 साल पूरा होने से पहले चुनावी प्रोसेस शुरू होना अनिवार्य है। कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पहले भी कई फैसले हैं कि अवधि खत्म होने से -4 महीने पहले प्रोसेस शुरू करना पड़ता है प्रदेश सरकार बार-बार चुनाव आयोग की चिट्ठियों को नज़रअंदाज़ कर रही थी। कभी डिज़ास्टर का बहाना, कभी अन्य वजहें इसीलिए कोर्ट में याचिका दायर हुई।
कोर्ट का अंतिम निर्णय
कोर्ट ने सरकार के दोनों तर्कों को खारिज करते हुए कहा :
डिज़ास्टर की दलील पर्याप्त नहीं है।
देवेंद्र सिंह नेगी केस में भी विस्तार की सीमा 6 महीने तक ही है, और यहां भी सिर्फ अप्रैल तक की छूट दी जा रही है
चुनाव टालना विकल्प नहीं है
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